यह संसार विमुख तरंगों कि छाव है | जो अपने अन्तरंग में विभिन्न तथा दुर्लभ वस्तुओं कि प्रणाली को छुपाए हुए है | अर्थात संसार के सारे तथ्य हमारी प्राचीन रंग -बिरंगे सभ्यता तथा संस्कृति को समय -समय पर
सींचते रहे हैं | इस प्रक्रिया के कारन हमारा सरल ,संसारिक क्रिया-कलाप फलता -फूलता रहा है |
सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे सामने जो सभ्यता व्याप्त है उसका उत्थान कहा हुआ ?
दुनियां वाले सभ्यता कहां सीखी ?
बड़े गर्व कि बात है की सभ्यता का संबध हमारे मातृत्व से रहा है |
अर्थात प्राचीन काल से ही भारत, सभ्यता तथा संस्कृति का मुख्य केंद्र रहा है | भले ही समय -समय पर हमारी संस्कृति को दबाने का प्रयास किया गया हो मगर वे अपने दिव्य रौशनी से हमेसा हमें प्रकाशवान करती रही
है | इसी प्रकाश को आंतरिक रूप से ग्रहण करके हमारी अभिलाषा
जीवंत रहा है | अर्थात हम अपने सतरंगी सभ्यता कि चादर ओढ़ कर सत्य कि स्थापना हेतु उत्कृष्ट मार्ग कि ओर अग्रसर रहे हैं |
यानी हम कह सकते हैं की हमारा शरीर सकारात्मक व सहजता से गुथा हुआ है जो समाज तथा देश के कल्याण के वास्ते हर वक्त न्योछावर है | मगर २१वीं सदी कि व्यवस्था हमारी संस्कृति पर आतंरिक रूप से चोट पहुंचा रहा है |
खास कर कर राजनीतिक व्यवस्था | ये हर व्यवस्था को अपने कुचक्र से प्रभावित करने क लगातार प्रयास कर रही है | कुचक्र इतना ताकतवर तथा समुंद्री तूफान कि तरह है जो अन्याय था असत्य को पुष्ट करते जा रहा है | जो हमारे धरती के सुंदर रंगों को बेरंग कर सकते हैं |
मगर हमारा विश्वास है कि सत्य कि ही एक दिन जीत होगी |
धरती पर फैलने वाले असत्य ,भ्रष्टाचार ,अन्याय और असामाजिकता एक दिन प्रास्त होगा |

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