Tuesday, 5 November 2013

सभ्यता


यह संसार विमुख तरंगों कि छाव है | जो अपने अन्तरंग में विभिन्न तथा दुर्लभ वस्तुओं कि प्रणाली को छुपाए हुए है | अर्थात संसार के सारे तथ्य हमारी   प्राचीन रंग -बिरंगे सभ्यता     तथा संस्कृति को समय -समय पर 
 सींचते रहे  हैं | इस प्रक्रिया के  कारन हमारा सरल ,संसारिक क्रिया-कलाप फलता -फूलता रहा है | 
सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे सामने जो सभ्यता व्याप्त है उसका उत्थान कहा हुआ ?
दुनियां वाले    सभ्यता कहां सीखी ?
बड़े गर्व कि बात है की सभ्यता का संबध हमारे  मातृत्व से रहा है | 
अर्थात प्राचीन काल से ही भारत, सभ्यता तथा संस्कृति का मुख्य केंद्र रहा है | भले ही समय -समय पर हमारी संस्कृति को दबाने का प्रयास किया गया हो मगर वे अपने दिव्य रौशनी से हमेसा हमें   प्रकाशवान करती रही
 है | इसी प्रकाश को आंतरिक रूप से ग्रहण करके हमारी अभिलाषा 
जीवंत रहा है | अर्थात हम अपने सतरंगी सभ्यता कि  चादर ओढ़ कर सत्य कि स्थापना हेतु उत्कृष्ट मार्ग कि ओर अग्रसर रहे हैं | 
यानी हम कह सकते हैं की हमारा शरीर सकारात्मक व सहजता से गुथा हुआ है जो समाज तथा देश के कल्याण के वास्ते हर वक्त न्योछावर है | मगर २१वीं सदी  कि व्यवस्था हमारी   संस्कृति पर आतंरिक रूप से चोट पहुंचा रहा है | 
  खास कर कर राजनीतिक व्यवस्था | ये  हर व्यवस्था को अपने कुचक्र से प्रभावित करने क लगातार प्रयास कर रही है | कुचक्र इतना   ताकतवर तथा समुंद्री तूफान कि तरह है जो अन्याय था असत्य को पुष्ट करते जा रहा है |     जो हमारे धरती के सुंदर रंगों को बेरंग कर सकते हैं | 
मगर हमारा विश्वास है कि सत्य कि ही एक दिन जीत होगी | 
धरती पर फैलने वाले असत्य ,भ्रष्टाचार ,अन्याय और  असामाजिकता एक दिन प्रास्त होगा | 

No comments:

Post a Comment