Wednesday, 20 August 2014

विदेश नीति के मोर्चे पर सक्रियता





नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल से पहली बार हुआ है कि भारत के किसी प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में सभी सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने भी शिरकत की | वहीं भारत की  नई  सरकार ने  चीन से भी रिश्ते और प्रगाढ़ करने का इरादा किया है  । यही कारन है की चीन ने अपने विदेशमंत्री वांग यी सिक को दिल्ली भेजने का निर्णय किया | यूरोपीय देशो से भी सकारात्मक संदेश आने लगे हैं | ब्रिक्स यानी भारत, चीन, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के समूह की बैठक के समय भी भारत अपने विदेश नीति को मजबूती से प्रस्तुत किया  | जी-20 ,जी-8 जैसे सगठनों   में भी भारत अपना कद बढ़ाने के लिये हर तरह की विदेश  नीतियों का सहारा लेगा | पाकिस्तान सरकार के द्वारा 151 भारतीय मछुआरों को और श्रीलंका सरकार द्वारा बंधी बनाये गये  सभी भारतीय मछुआरों को रिहा कर देना विदेश नीति के मोर्चे  पर  सक्रियता की  झलक मिलाती है |

मगर क्या भारत के लिये यह सब कुछ इतना आसान रह गया है ? क्योंकि पिछले 10 सालों में भारत की  विदेश नीति बिल्कुल खस्ता हाल हो गई  है | जिस कारन फिर से सक्रियता काफी मुश्किल में  नजर आ रही  है | क्योंकि चीन के साथ हमारे  सबंध  जमीनी स्तर पर बहुत असंतुलित है| चीन के साथ वर्तमान   व्यापार घाटा तीस अरब डॉलर से ज्यादा होने का अनुमान है | 1000 किलोमीटर से ज्यादा फैले सीमा पर चीन की ओर से अतिक्रमण की घटनाएं सामने आती  रहती है | अगर बात पाकिस्तान की करे तो, ,जब युद्ध विराम के उलघंन की घटनाएं सामने आती हैं तो  यथास्थिति और आपसी भरोसा बनाए रखने की बात कई बार अपना अर्थ खो देती है | सीमापार की जेलों  में बरसों से बंद लोगों के लिये भारत सरकार की  नीति की जग हँसाइ किसी से छिपी  नहीं है|  श्रीलंका के तमिल समुदाय के मानवाधिकारों के सवाल पर भारत के उतार-चढ़ाव वाली  प्रक्रिया से भी  विदेश नीति   की  कमर टूट गई है  |  शेख हसीना के कार्यकाल में बांग्लादेश से भारत के संबंध बेहतर हुए, पर दोनों देशों में बहने वाली नदियों के जल-बंटवारे और सीमांकन को  लेकर हमेशा विवाद रहता है | नेपाल में भारत विरोधी ताकतों का उभरना विदेश नीति के लिये नया संकट है |वैश्विक मंचों पर भी कमजोर विदेश नीति के कारन भारत को  अमरीका का पिछलग्गू बनना पड़ता है | वहीं हाल ही के  दिनों में रूस का पाकिस्तान की  तरफ झुकाव भी चिंता का विषय है | दूसरी ओर  इरान तथा गोल्फ देशों के साथ भी इस समय भारत के सबंध ठीक ढंग से उजागर नहीं हो पा रहे हैं | आज  भारत की   विदेश नीति को    विश्वभर में संदेह की  नजर से देखा जाता है | छोटे – छोटे देश भी भारत को समय – समय पर आंख दिखाने से नहीं चुकते हैं |
लेकिन अब समय आ गया है अपने आप को स्थापित करने का | दुसरे देशों में भारत को  प्रस्तुत करना जरुरी हो गया है | जी-20, विश्व व्यापार संगठन और ब्रिक्स जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को मजबूत दावेदार बनाना जरुरी है | सार्क देशों के साथ आपसी संबंध सुधारने की इच्छा प्रतीकात्मक नहीं रहनी  चाहिए | वहीं आम लोगों के लिये  सद्भावना को भी ध्यान में रख कर काम करना होगा | विश्व मंच देशों के साथ द्विपक्षीय मसलों पर बातचीत शुरू होगी, तभी विदेश नीति के मोर्चे पर सक्रियता बढ़ेगी

Thursday, 24 April 2014

सांप्रदायिकता से मोह भंग ,विकास को मिला रास्ता




2014 का चुनाव ज्यों - ज्यों नजदीक आते जा रहा है लोगों  का धरकने बढ़ता ही जा रहा है | तरह - तरह के चर्चाओं का बाजार गर्म है | सब अपना - अपना राय देने में मशगुल है कोइ कुछ बोलता है तो  कोइ कुछ मगर जो भी नेता लोग अपने कार्य में बखूबी लग गए हैं | हर जगह रैली होरहे हैं पुरा देश इस में उलझा हुआ है |कोइ भी इस बार चुकाना नहीं चाहता है | हर कोइ अपने आप को प्रधानमंत्री से कम नहीं समझ रहे हैं | सब अपना अपना दावा ठोक रहे हैं | इस बार छोटे तथा मझोले दल भी अपने आप को कम नहीं समझ रहे हैं |उनका मनाने कुछ भी मगर जनता पुरा आनंद ले रहे हैं |इधर भाजपा ऐसे दावे ठोक रहे हैं जैसा की लगा रहा है की उनका सरकार बन गया | वहीं सोनिया फिर से वापसी के नारे लगा रहे हैं तो  मुलायम और उनके सहयोगी तीसरे विकल्प की बात कर रहे हैं |मगर मोदी और राहुल खासे चर्चा के विषय बने हुए हैं | मोदी युवा तथा विकाश के नाम तालठोक रहे हैं तो राहुल सबको साथ चलने के नाम पर | भाजपा मोदी को जीता ने में कोइकसर नही छोरना नही चाहते हैं |मगर ये सारे राजनितिक दल सांप्रदायिकता को भी नहीं भूल रहे हैं |वहीँ  लगों का मन इन सब बातों से उब चूका है| वे अब विकाश चाहते हैं |वे भी अब अपने जिन्दगी को सुनहरा बना चाहते हैं |वे भी शिक्षित होना चाहते हैं |
हम इसी कड़ी में खजरहो के लोगों से मिले| वहां के लोग सजग हो रहे हैं वे अब अपने अधिकार को समझाने लगे हैं |वे अब किसी भी तरह से नेताओं  के झासे में नहीं आने वाले हैं |हर वर्ग चाहे वो युवा या महिला हर कोइ अब विकाश चाहता है | खजरहो के लोगों का मानना था की वे लोग अब चुनाव में नसा तथा पैसा जैसे लोकलुभावान चीजों से बच रहे हैं | उनका यह भी कहना था की जब इस चुनाव में नेता उनसे मिलने आते हैं तो  वो विकाश की बातें करने पर मजबुर करते हैं वहीँ वे अपना माग़ भी सामने रखते हैं |  विधालय तथा सड़क अच्छे नहीं हैं इस  पिंड में जिसे वो बनवाना चाहते हैं |वहीँ नेताओं का आनाजाना अभी इस चुनाव में लगा ही रहता है | मगर यहाँ के लोगों को इस बार एक अच्छे इमानदार नेता चाहिए जो उनके परेसनियों को सुन सके समझ सके | ये तो चुनाव परिणाम आने के बाद ही पता चलेगा इस पिंड को इस बार कैसा नेता मिला ,और कितना विकाश को रहा है |
फिलहाल ये तो यकीन हो गया है की ये लोग अब सांप्रदायिक 
जैसे असामाजीक बातों से ऊपर उठ चुके हैं तथा अपने आप को
बदलना चाहते हैं ,अपने पिंड को बदलना चाहते हैं इस पिंड को
 बदला चाहते हैं इस देश को विकशित बनाना चाहते हैं |
  

        साक्षात्कार में पुछे गए कुछ सवाल


प्रश्न- आप का नाम क्या है ?
उत्तर – गुरमेल सिंह
प्रश्न - आप इस बार वोट किन बातों पर देंगे ?
उत्तर  – मैं इस बार वोट विकाश के नाम पर दूंगा
प्रश्न - दुसरे पिंड के मुकबले यह पिंड ज्यादा हीं विकशित है इसमे किसका योगदान है ?
उत्तर – जी इसमे NRI का योगदान है सरकार के तरफ से कुच्छ मदद नहीं  मिला
प्रश्न  - इस पिंड में चुनाव के नाम पर गुटबाजी है ?
उत्तर -- बिल्कुल नहीं
प्रश्न - आज नसा  बहुत ही बड़ी समस्या बन कर उभरी है चुनाव में इस पर चर्चा है ?
उत्तर – नहीं, आज 60 %लोग  हमारे पिंड में नसा ले रहे हैं मगर इसका उपाय कोइ राजनितिक दल नहीं कर रहे हैं |
प्रश्न – क्या आप नसा रोकने के कुछ कर रहे हैं ?
उत्तर – कर तो रहे हैं मगर कुछ हो नहीं रहा है |
प्रशन – क्या इस १९८४ दंगे के बारे में चुनावी माहोल है ?
उत्तर – बिल्कुल नहीं |
प्रश्न – क्या चुनाव में सरकार के तरफ से कोइ केम्पेन चलाया जा रहा है आपके पिंड में ?
उत्तर – नहीं अभी तक तो नहीं |
प्रश्न  - क्या आपके पिंड  को किसी चीज की जरुरत है ?
उत्तर – 12 तक विधालय के साथ अच्छे रोड |
जी धन्यवाद |

      

Wednesday, 23 April 2014

बदहाल शिक्षा के कारन



भारत आज दुनियां में हर क्षेत्र में अपना  दम-खम
 रखता है |जहाँ दुनियां भर में सैन्शक्ति में चौथे स्थान पर है वहीं 11 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है | आज विकाश के मामले में दुसरे स्थान पर है | हर ओर आज अच्छा कर रहा है हमारा देश |मगर एक ओर स्थिति जस की तस है अर्थात कहे तो शिक्षा |आज हमारे विधार्थी तो पुरे दुनियां में परचम लहरा रहे हैं मगर वे विदेशों में जाकर पढने को मजबुर है वहीं लगभग 40%अभी भी साक्षर नहीं है |वहीं विश्व के 200 अच्छे कालेजों की सूचि में भारत का एक नही नहीं हैं |देख कर तो यही लगता है शिक्षा अधिकार कानून कागजी ही साबित होगा|
          सीधे तौर पर देखा जाए तो इन सब चीजों के  प्रमुख कारन है सरकारी विधालय में फैले कुव्यवस्था | हकीकत यह है कि आज भी स्कूलों की दशा में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हो पाया है। बहुत सारे स्कूलों में न पर्याप्त कमरे हैं, न पीने के पानी, शौच, ब्लैकबोर्ड, पाठ्यसामग्री आदि की व्यवस्था।यहां तक की बहुत सारे राज्यों में अध्यापकों के हजारों पद खाली हैं| इसी क्रम मैं पंजाब एक गावं चखहकीम गया वहां पर भी कुछ ऐसा ही नजारा मिला देखने को |हालांकी वहां पर शिक्षकों ने सरकार पर आरोप लगाया |यहां पर दो सरकारी विधालय है मगर दोनों हीं बदहाल एक प्राथमिक विधालय दूसरा मध्यविधालय  | जब मैं गया तो देख कर दंग रह गया वहां के बच्चे  विधालय में पढ़ नही रहे थे बल्की खेल  रहे थे | प्राथमिक विधालय में तो बच्चों के बैठने के लिये खुले आसमान थे |वहीं कुछ बच्चे लगनशील नजर दिखे | वहीं कुछ बच्चे विधालय के बहार बैठे थे और उसे समझाने वाला कोइ नहीं था |और तो और 12:30 PM में मध्यानभोजन बनाना ही सुरु हुआ था |वहीं सारे शिक्षक आपस में गप्पे लारा रहे थे| कुछ बच्चे पानी पिला रहे थे शिक्षकों को जबकि इसके लिये अलग से हर विधालय में कर्मचारी रखा गया है |वहीं तस्वीर भी उतारने नही दिया गया था |

मगर यह स्थिति हर जगह की है |वहीं इसके सुधार के उपाय किया जरह है मगर सरकार अभी भी सोए हुए है | ऐसे में नेशनल कोलिशन फॉर एजुकेशन नामक संस्था की ओर से दायर याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने उचित ही केंद्र और सभी राज्यों से पूछा है कि शिक्षकों की भारी कमी की सूरत में किस तरह शिक्षा अधिकार कानून का लक्ष्य पूरा किया जा सकेगा। बुनियादी शिक्षा के मामले में सरकारों का रुख छिपा नहीं है। केंद्र ने शिक्षा का अधिकार कानून लागू तो कर दिया, पर इसके लिए संसाधन जुटाने की चुनौती से सरकारें आंख चुराती रही हैं।दुःख बात है हमारे देश में अभी तीन करोड़ अस्सी लाख बच्चे स्कूली पढ़ाई से वंचित हैं।अर्थात हमें इसे बदलना होगा चकहकीम जैसे गांव सुरुआत करना परेगा |

प्रियंका गांधी और 2014 चुनाव

हर बार की इस बार भी प्रियंका गांधी चुनाव में सक्रिय है | यह बात अलग है की वे अपने राजनीतिक जीवन को बस परिवार तक रकहना चाहती है |  मगर इस बार कुछ समय के उनका नाम भी राजनीति में उछला | मगर वह सीधे तौर पर इस बात को नकार गई | 
मगर कुछ जानकारों का कहना है की अगर वह चुनाव में उतरती तो राहुल से ज्यादा प्रभावी हो सकती थी | 
मगर जो भी उन्होंने काफी ज्यादा ही इस बार विरोधियों पर हमला कर रही है | जीस कारन अमित साह जैसे लोगों के निशाने पर रहीं है | 
बतौर प्रियंका ने विरोधियों पर हमला बंद करने के बजाए और बढ़ा ही दी | उन्होंने रायबरेली में कहा की ,विपक्षी दल भ्रष्टाचार हटाने की बात करते हैं लेकिन उन्हें यह बताना चाहिए कि वे इस बुराई को कैसे हटाएंगे। कांग्रेस ने सूचना का अधिकार कानून देकर यह बताया कि हम कैसे भ्रष्टाचार रोकेंगे। कांग्रेस ने सूचना का अधिकार कानून लागू करके भ्रष्टाचार को रोका।आपके बीच लोग प्रचार करने आते हैं, आप उनसे पूछिये कि विकास के लिए वे क्या कर रहे हैं। उन्होंने आपके लिए क्या किया है। लोग आते हैं, भाषण देते हैं लेकिन आपके लिये क्या करेंगे, यह नहीं बताते।
वे इस दौरान  अपने परिवार की उपलब्धियां गिनाईं और  स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं के बारे में पूछा और कहा ‘‘तुम्हें पता है कि तुम्हारे इस कार्यक्रम को अमेठी से राहुल जी ने शुरू किया था। वर्ष 2004 में जब वह सांसद बने तो उन्होंने सोचा कि इसका विस्तार किया जाए। तो इसे अमेठी के साथ रायबरेली में भी फैलाया गया। तब से आप लोगों ने देखा कि कितना विकास हुआ है।’
 ये तो चुनाव परिणाम ही बताएगा की  अपने परिवार और कांग्रेस को सहायता पहुंचती है | यह चुनाव उनके राजनीतिक भविष्य के लिये भी चुनौती है | 

Wednesday, 22 January 2014

INADIAN POLITICS with KEJRIWAL

India is the biggest democracy of World. And politics has been an indispensable part of this democracy. In this democracy everyone has a right to anything and everything but people from time to time have been miss using this power. even after 65 years of Independence we still fight for our basic necessities. Like poverty, illiteracy, unemployment,m etc. India has witness all sort of corruption less politicians, but still our population lives in same situation as they did when e got independence , even today you can see people sleeping on streets, children working in hazardous industries, girls suffering scars of dowry, women rapped in mid road.
similarly, kejriwal also took an initiative to irradiate these problems, and entered the politics with same objective in his mind. he claims that he is self sufficient to do so. for which he is still holding up the revolution. due to which now he is in the eye of every politician and also media. media long with the scared politician believe his ways of working and protesting unlawful. to some extent, yes common people suffered there ere ambulances strucked in "bands" metros delaying peoples travel and more.
But the million doller question is hat forced Mr. Chief minister to come don t such levels of foot paths? whose mistake this all as? police or Mr. kejriwal?? police is hitting the ball into union governments court by saying that they just followed the orders.
weather India is ready for the change or not will be decided in upcoming election till then enjoying watching the game of POLITICS.  

Monday, 11 November 2013

समाचार



आज संचार की मांग जोरों पर है | क्योंकि यह  संचार नाम के शब्द आज

 हर ओर नया नही रहा है | आज कोइ भी व्यक्ति इससे बच नही पाया है

 चाहे जो हो हर कोइ इसका उपयोग कर रहा है चाहे जिस काम में हो |

मगर समाचार को सुनने की ललक ने लोगों में आज कुछ ज्यादा ही हो 

गया है | शहर से लकर गांव तक हर कोइ समचार के पीछे भाग रहे हैं | चाहे 
उसे समझ में     आते हो या ना आते हो मगर आज लोग सुने बिना नहीं रह 
सकते हैं | चाहे वो घर पर हो या घर से बहार उसे पल -पल कि जानकारी 

चाहिए | हर तरह समचार सुनना वे जरुरी समझते हैं जैसे खेल ,व्यपार

 ,मनोरंजन इत्यादी |
  दूसरी तरफ मिडिया समूह भी लोगों को ध्यान में रख कर कार्य कर रहे हैं 

साथ ही साथ समाचार समूहों की लिस्ट बढ़ते हि जा रहा है    | कुछ लोग 

मासले तरह समचार सुनना पसंद करते हैं तो उसके लिये मसाला पेस 

किया जा रहा है | अगर आप समचार में वाद विवाद देखना पसंद करते हैं

 तो ये भी कुछ समाचार चैनल पेस कर रहे हैं | वहीं घरेलू महिलाओं को 

लुभाने के लिये सास बहु वाले समचार पैकेज तैयार किया जा रहा है |

वहीं मौजूदा नीति के तहत एफएम रेडियो को आकाशवाणी के समाचार

 बुलेटिन को बिना किसी हेरफेर के प्रसारित करने की अनुमति है। खेल,

 यातायात, मौसम, सांस्कृतिक कार्यक्रम, शिक्षा, रोजगार, स्थानीय 

निकायों की ओर से की गई सार्वजनिक घोषणाओं से संबंधित समाचार

 प्रसारण करने की भी छूट है।

वहीं आज मोबाइल कम्पनी समचार को अपने व्यसाय से जोर कर खुब

 कमा रहें हैं | क्योंकि अब न्यू मीडिया

का भरमार सा हो गया है | लोग अपने तरीकों से समचार देखते हैं और 

सुनते हैं |

मगर अभी के समय में समाचार का स्तर बुरी तरह से गिरते जा रहा है 

   सीधे अर्थों में अब समचार अब समचार नहीं रहा बल्की मनोंरंजन का 

साधन बन चूका है जो बिल्कुल आधारहींन बन होते जा रहा है |समचार से 

सच्चाइ  धीरे -धीरे गायब होते जा रहे हैं | कारन बिल्कुल साफ है क्योंकि 

मिडिया आज व्यवसाय क रूप ले चूका है |

 हमें इसका विरोध करना चाहिए ताकि हमारे देश की अन्दुरुनी स्थिति 

सही रहे |

हब सब मिल कर काम करें




















बात उस समय कि है जब मैं  १२ वीं क्लास में पढता था | पुरे मस्ती के 

साथ समय गुजर रहा था | मुझे लगता था कि संसार बस इतना सा ही है |

जो मन में आता वही करता   था | बस अपने धुन में लगा रहता था |किसी 

 फिकरमंद आदमी से बिल्कुल परे ,सोच रहीत तथा ज़माने से  दूर |

साधारण सब्दों में कहे ठंढे छाव के तरह था हमारा जीवन |

हम बहुत मेहनत कर रहे थे अपने सपने को पुरा करने के लिये | बस अपने

 देश  को हर चीज में आगें देखना चाहते | खास कर क्रिकेट को अपना धर्म 

समझते थे | जिस दिन मैच होता था उसके पहले रात में ठीक ढंग सो नहीं 

पाते थे | हर समय लगा रहता था पता नहीं कल क्या होगा कौन जीतेगा ,

धोनी का सतक लगेगा या नहीं | इस चक्कर में कइ  बार माँ से डाट भी 

परता |

वहीं राजनीतिक  जैसे चीजे उस  समय हमारे समझ में नही आता था |

बेरोजगारी , महगाई,भ्रष्टाचार जैसे शब्दों से कुछ मतलब नही था |

एक बार कि बात है ,१५ अगस्त नजदीक था मैं अपने दोस्तों के साथ एक 

दुकान पर कुछ खरीद रहा था | तभी मेरा नजर एक ओर जा कर टिक गया |

एक बच्चा जो सकल से गरीब नजर अता था पता नहीं क्यों उसे मैं बार-

बार देखे जा रहा था | मेरा पलक उसे बार - बार निहारे जा  था | मैं बिल्कुल 

हैरान परेसान था | वह बच्चा धीरे - धीरे हमारे ओर ही चले आ रहा था |

भले ही वो मैले कुचले कपरे पहने हो मगर उसके शरीर से एक अलग ही 

तरह का उर्जा निकल रहा था | उसके ललाट से एक तेज निकल रहा था जो

 मुझे बार-बार उसको देखने पर मजबुर कर रहा था | वह धीरे - धीरे कर के 
     
मेरे पास पहुँच गया और अपने मैले कपड़े से १० का घिसा सा नोट निकला 

और दुकानदार से तिरंगा मागां मगर दुकानदार ने झल्लाते हुए   कहा ,  

 इतने कम     पैसों में तिरंगा कहां से होग बेटा और  पैसा लाओ ?

यह बात सुनते ही बेचारा बहुत उदास हो गया और रोने लगा | यह सब देख 

कर मुझे  बहुत बुरा लगा | तत्काल मैने अपने कुछ पैसे मिला कर उसे

 तिरंगा तो खरीद दिया मगर मुझे कुछ बातें सोचने पर मजबुर कर दिया -

जैसे कि हमारे देश में इतना गरीबी क्यों है ?

बरोजगारी क्यों नहीं कम हो रहा है ?

महगाई क्यों बढ़ते जा रहा है ?

क्या इन सब चीजों से हमारे देश को निजात मिलेगा ?

जरुर मिलेगा जब हब  सब मिल कर इसके खिलाफ काम करें |