आज आस्था कारोबार का रूप ले चूका है | हर ओर आस्था के नाम पर नंगा
नाच हो रहा है | हर कोइ आस्था के नाम पर अपना रोटियां सकने में लगे हैं
| चाहे वो बाबा लोग हो या राजनितिक दल हर कोइआस्था में अपना
कारोबार कर रहे हैं | उन्हें इस कार्य में जरा सा भी सर्म नही लग रहा है | वे
इस चक्कर में धर्म को भी बदनाम कर रहे हैं | वे कद्र करना भूल चुके हैं
आस्था को , वे बस खुद के बारे में सोचते जा रहे हैं | आस्था से निकलने
वाली हर तरंग आज विमुख हो चूका है |उसमे अब पहले वाला धार नहीं
बचा जो लोगों के अंदर जोस जगाया करता था |आस्था से निकालने वाला प्रकाश भी अब बुझ सा गया है |
इन सब का कारन है कारोबार|कुछ साल पहले लोग घंटों अपना समय
पूजा-पाठ में बिता दिया करते थे । मगर अब इन अंधविश्वासों और
आडंबरों को तर्क की दृष्टि से देखने की नई आदत लग गइ है। हालांकि
ईश्वर में आस्था अब भी बरकरार है, लेकिन धर्म-स्थलों पर व्याप्त
बुराइयों से लोगों का मन दुखी हो जाता है।
इन जगहों पर बस ये अब बातें घुमती रति है ,चप्पल ठीक से रखो; कहीं
यह आदमी हमें ठग तो नहीं रहा; पंडितों के चक्कर में मत पड़ो, वरना
जेब खाली हो जाएगी; आमतौर पर इतनी गंदगी, मानो कोई कचरा घर
हो; दर्शन के लिए लाइन में खड़े-खड़े हालत खराब आदि।
होटल में रुकने का किराया दिन और भीड़ के हिसाब से तय किया जाता
है। शनिवार और रविवार को छुट्टी का दिन होने की
वजह से ज्यादा दर्शनार्थी जुटते हैं, सो उस दिन कमरे के लिए मोटी
रकम
चुकानी पड़ती है। गया का विश्व प्रसिद्ध
मंदिर हो या बौद्धों की सबसे पावन-भूमि बोध गया, कमाई के लिए तरह-
तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं। खासकर विदेशी
पर्यटकों से छोटी-छोटी चीजों के लिए मनमानी रकम वसूली जाती है।
कारन साफ है आज हर तरह के व्यवसाय आस्था से जुर चूका है |
मगर अभी भी समय है इसे ठीक करने का हम चाहे तो इन सब बुराइयों को
भगा कर अपने धर्म को
बचासकते हैं | इसका सुरुआत हम युवावों को करना परेगा क्योंकि हैं की
युवा बढेगा तो देश बढ़ेगा
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