सड़कों पे लोगों को बिलखते देखा है,
इसी भारत में में अनाजों को गोदामों में सड़ते देखा है,
लोगों को को पानी के लिये तरपते देखा है,
इसी भारत पाइपों से पानी को बहते देखा है,
भारत को नेताओं से लुटते देखा है,
युवाओ को रोजगार के लिये भटकते देखा है,
खुले आसमां में लोगों को ठण्ड में तड़पते देखा है,
नेताओं के खाली पड़े बंगलों में ताला लटकते देखा
है,
इसी भारत में लोगों को मरते देखा है,
इसी भारत में सड़कों पे भ्रस्टाचार देखा
है|
समय है समाज बदलने बदलो,
सोच बदलने बदलो,
विकाश करो ,
खुद को बदलो ,
और बदलो भारत
-------नवनीत अमर

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